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कैसे हो भइया,कैसी हो माई,प्रियंका गांधी दे रहीं हैं रिश्तों की दुहाई

 रायबरेली।प्रियंका गांधी वाड्रा ने राहुल गांधी का प्रचार अभियान संभाल लिया है। प्रियंका दादी इंदिरा गांधी और पिता राजीव गांधी के संबंधों की याद दिलाने के साथ न्याय पत्र की घोषणाओं पर जोर दे रही हैं।छह मई से प्रियंका रायबरेली में डटीं हैं।देर से आने के लिए माफी चाहती हूं,लंबा भाषण दूं या छोटा। प्रियंका के सवाल पर जनसमूह से आवाज आती है, जितना मन हो बोलिए।चिर-परिचित मुस्कान देकर प्रियंका पूछती हैं, मेरे भैया राहुल को आप लोग जानते हैं भीड़ जवाब देती है हां देश के नेता हैं।

प्रियंका कहती हैं वही देश का नेता आप लोगों के लिए चार हजार किलोमीटर पैदल चलता है और आपके प्रधानमंत्री के कपड़ों पर धूल नहीं, एक बाल इधर से उधर नहीं,आपको नेता चाहिए या राजा। उत्तरपारा की नुक्कड़ सभा में इस तरह का संवाद करने के बाद प्रियंका का काफिला कुचरिया की ओर चलता है। प्रियंका का कुचरिया में भी इसी तरह के सवाल-जवाब और जनता से संवाद थे।

मंच से उतरते ही कोने में खड़ी कुछ महिलाओं की तरफ प्रियंका बढ़ती हैं।एक का हाथ पकड़कर पूछती हैं, कैसी हो माई जवाब आता है अच्छी हूं।महिला के दोनों हाथ पकड़कर प्रियंका पूछती हैं महंगाई बहुत बढ़ गई है न,प्रियंका के हाथ में तो महिला के हाथ होते हैं।किसी के घर में अचानक पहुंचकर महिलाओं से बच्चों की पढ़ाई और महंगाई पर बात तो किसी दुकान पर जाकर कारोबार की बात। पिछले चार दिन से प्रियंका की यह प्रचार शैली रायबरेली में चर्चा का विषय बन गई है।

गाड़ी में बैठते समय एक युवक की नमस्ते का जवाब देकर पूछती हैं कैसे हो भइया।हर भाषण में इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की जिक्र करके प्रियंका रिश्तों की दुहाई देना नहीं भूलतीं।कांग्रेसी प्रियंका में इंदिरा गांधी की छवि देखकर मुदित हैं तो विरोधी कहते हैं कि चुनाव के समय ही रायबरेली याद आती है, पिछले पांच साल तो कोई नजर नहीं आया।

बरहाल पक्ष विपक्ष के तर्क अपनी जगह हैं,लेकिन राहुल गांधी तीन मई को नामांकन करने के बाद से रायबरेली नहीं आए हैं और छह मई से प्रियंका रायबरेली में डेरा डाले हुए हैं। अमेठी की हार का सबक कहें या भाजपा की रणनीति से किला बचाने की जुगत, प्रियंका ने चार दिन से बगल की सीट अमेठी का रुख भी नहीं किया। प्रियंका का पूरा ध्यान रायबरेली पर है।दो दिन में 41 नुक्कड़ सभाएं, जनसंपर्क और कार्यकर्ताओं के साथ मैराथन बैठकों में व्यस्त प्रियंका जानती हैं कि रायबरेली के बाद अमेठी हाथ से जाने के मायने क्या हैं। एक दिन में 20 से अधिक नुक्कड़ सभाओं के बाद भुएमऊ गेस्ट हाउस में रोज कार्यकर्ताओं के साथ एक-एक बूथ पर मंथन और अगले दिन के कार्यक्रम पर चर्चा में प्रियंका की व्यस्तता बताती है कि क्यों उन्होंने खुद चुनाव नहीं लड़ा। गांधी परिवार की राजनीतिक वंशबेल का पोषण करने वाली रायबरेली का महत्व कांग्रेस जानती है।

जब किसी सभा में प्रियंका कहती हैं कि मैं पापा के साथ यहां आई थी तो लोगों को उस कालखंड में ले जाना चाहती हैं, जब कांग्रेस और प्रधानमंत्री एक-दूसरे के पूरक थे।कांग्रेस काल में स्थापित आईटीआई स्पिनिंग मिल और रेल कोच फैक्ट्री की चर्चा प्रियंका तो करती हैं, साथ में यह भी जोड़ती हैं कि भाजपा और राज्य सरकारों ने इसकी उपेक्षा की।प्रियंका को सुनने और देखने की ललक ऐसी है कि उनकी सभा में उनसे असहमति जताने वाले भी नजर आते हैं। 

बता दें कि बच्चे को दुलराना,क्या खाना बना है, किस क्लास में पढ़ रही हो जैसे संवादों से देहरी की हिचक तोड़ रही प्रियंका रायबरेली को मथ रही हैं और भाजपा इसके तोड़ का मंथन ढूंढ़ रही है।

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