कल्पना कीजिए एक ऐसी दुनिया, जहाँ अपराध का पैमाना यह ना हो कि क्या गलत है, बल्कि यह हो कि गलती करने वाला कितना ताकतवर है। जहाँ यौन हिंसा की शिकार लड़कियों की आवाज़ को दबाने के लिए अरबों डॉलर, जासूस और वकीलों की फ़ौज खड़ी कर दी जाए। यह कोई फिल्मी कहानी नहीं, बल्कि जेफ़री एपस्टीन नाम की उस दरिंदगी की असल ज़िन्दगी है, जिसके दस्तावेज़ आज 'एपस्टीन फ़ाइल्स' के नाम से दुनिया के सामने हैं। एपस्टीन की ऐसी ही एक महत्वपूर्ण सहयोगी गिलेन मैक्सवेल को साल 2021 में नाबालिग लड़कियों को फुसलाने और उनका यौन शोषण कराने में सहयोग के इल्ज़ाम में मुजरिम ठहराया गया. लड़कियों के लिए मर्दाना ताक़त का कुचक्र अँधेरे कुएँ की तरह है. उन्हें फँसाया जाता है. वे फिर मानो किसी दलदल में फँसती चली जाती हैं. यह महज़ कुछ कागज़ों का ढेर नहीं है। यह उस मर्दाना सत्ता तंत्र का आईना है, जो सदियों से चुपके-चुपके अपने जाल बुनता आ रहा है। एपस्टीन और उसकी सहयोगी गिलेन मैक्सवेल ने अमीरी, रसूख और राजनीतिक ताकत का इस्तेमाल कर एक ऐसा अंडरग्राउंड नेटवर्क खड़ा किया, जहाँ मासूम लड़कियां एक करेंसी की तरह इस्तेमाल की गईं...
कोर्ट की टिप्पणी ने एक नई बहस छेड़ दी है कि क्या भारत में भी बच्चों के लिए फेसबुक-इंस्टाग्राम के दरवाजे बंद होने वाले हैं?" मदुरै (तमिलनाडु): सोशल मीडिया की दुनिया बच्चों की मासूमियत के लिए अब एक बड़ा खतरा बनती जा रही है. अश्लील सामग्री की आसान पहुंच और रील की लत से बच्चों को बचाने के लिए अब मद्रास हाई कोर्ट ने एक बेहद सख्त रुख अपनाया है. ऑस्ट्रेलिया में 16 साल से कम उम्र के बच्चों पर लगे सोशल मीडिया बैन का उदाहरण देते हुए अदालत ने केंद्र सरकार से भारत में भी इसी तरह की पाबंदी लागू करने पर विचार करने को कहा है. मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ ने केंद्र सरकार को 16 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया वेबसाइटों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने की सलाह दी है. न्यायमूर्ति जी. जयचंद्रन और न्यायमूर्ति के.के. रामकृष्णन की पीठ ने याचिका पर सुनवाई की. केंद्र और राज्य सरकारों ने इस मामले पर अपने तर्क पेश किए. सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद न्यायाधीशों ने अपना आदेश जारी किया. पीठ ने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा 2017 में जारी आदेश के अनुसार, यह पुष्टि हो चुकी है कि ऐसे विवादास्पद और अश्लील ...