बिजली विभाग के जेई पर चाकू से हमले का प्रयास
सुल्तानपुर के कादीपुर कोतवाली अंतर्गत सूरापुर का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है। जिसमें एक युवक ने बिजली विभाग के जेई पर चाकू से हमले का प्रयास किया। बिजली विभाग की टीम शनिवार को उससे बकाया वसूलने पहुंची थी, जिस पर पहले तो आरोपी युवक ने अभद्रता किया और फिर चाकू लाकर हमले का असफल प्रयास किया। शनिवार को कादीपुर उपकेंद्र के जेई सुमित कुमार मंडल अपनी टीम के साथ सूरापुर क्षेत्र में बकायदारों से वसूली के लिए निकली थी। इस बीच बाजार में वसूली करते हुए टीम जब सिनेट्री दुकानदार सतीश (35) पुत्र बाके लाल के पास पहुंची और बकाया जमा करने को कहा तो वो बिजली विभाग की टीम से उलझ गया। पहले तो उसने जेई से अभद्रता किया, फिर जब बात बढ़ी तो दौड़कर दुकान के अंदर गया और एक चाकू लेकर आया। उसने चाकू निकालकर हमले का असफल प्रयास किया। हालांकि आसपास के लोगों ने मौके पर पहुंचकर बीच बचाव किया तब कही जाकर जेई की जान बची। इसी दौरान जेई ने पुलिस को फोन किया। जिस पर पुलिस भी घटनास्थल पर पहुंच गई। पुलिस ने आरोपी युवक को हिरासत में लिया और थाने लेकर आई है। वही जेई सुमित कुमार मंडल ने आरोपी के विरुद्ध तहरीर कोतवाली में दी है। सीओ कादीपुर विनय गौतम ने बताया कि तहरीर के आधार पर विधिक कार्रवाई की जा रही है। वही जेई सुमित कुमार मंडल ने बताया कि आरोपी सतीश का लगभग 80 हजार रूपए का बिजली का बिल बकाया था। उससे बिल जमा करने को कहा गया तो वो अभद्रता पर उतर आया। उन्होंने ये भी बताया कि जब से कनेक्शन लिया गया है तब से आजतक एक बार ही जमा हुआ है।
अभिभावकों की जेब पर बढ़ता बोझ, निजी स्कूलों, प्रकाशकों की सांठगांठ पर उठे गंभीर प्रश्न सुल्तानपुर जिले में शिक्षा के बढ़ते व्यवसायीकरण को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। स्कूलों में इस्तेमाल होने वाली पाठ्यपुस्तकों की कीमतों को लेकर अभिभावकों में नाराजगी बढ़ती जा रही है। आम धारणा बनती जा रही है कि कागज़ से छपने वाली इन किताबों के दाम ऐसे वसूले जा रहे हैं, मानो वे “सोने-चांदी” से तैयार की गई हों। स्थानीय स्तर पर कई अभिभावकों का कहना है कि हर साल नए सत्र में स्कूलों द्वारा निर्धारित की गई किताबें केवल चुनिंदा दुकानों पर ही उपलब्ध होती हैं, जहां उनकी कीमत बाजार दर से कहीं अधिक होती है। इससे यह संदेह गहराता है कि स्कूल प्रबंधन और प्रकाशकों के बीच किसी प्रकार की मिलीभगत है। विशेषज्ञों के अनुसार, अच्छी गुणवत्ता वाली मोटी किताब छापने की वास्तविक लागत इतनी अधिक नहीं होती,जितनी कीमतपाठ्य पुस्तकों की कीमत छात्रों से वसूली जाती है। इसके बावजूद, अभिभावकों को मजबूरन वही किताबें खरीदनी पड़ती हैं, क्योंकि स्कूलों में अन्य विकल्प स्वीकार नहीं किए जाते। शिक्षा माफियाओं का जाल? ...

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