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✍️ कश्मीर के काले दशक: कैसे घाटी 'पोर्न-हब' में बदल गई !

पिछले हफ़्ते ही सोशल मीडिया पर एक तस्वीर वायरल हुई थी ! जिसमें एक कश्मीरी मुस्लिम बुज़ुर्ग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बड़े स्टैंडी को बड़े प्यार से चूम रहा था। पीएम मोदी के आलोचकों और विपक्षी पार्टियों के लिए, यह सत्तारूढ़ बीजेपी द्वारा अच्छी तरह से प्रबंधित एक पीआर स्टंट था। लेकिन एक आम कश्मीरी मुसलमान अनुच्छेद 370 के हटने के बाद घाटी में आए बदलावों को स्वीकार कर रहा है। कई दशकों से, कश्मीर की सबसे सुंदर घाटियों ने जिहादियों द्वारा स्थानीय महिलाओं के खिलाफ़ क्रूर यौन हिंसा की कुछ सबसे गहरी विकृत कहानियों को छुपाया है। कश्मीर में आतंकवादियों के लिए, सेक्स उनका धर्म था और घाटी... उनका पोर्न हब।

बुरहान वानी, जो पिछले एक दशक में घाटी में आतंकवाद का 'पोस्टर बॉय' बन गया था, जिसे कश्मीरी मुस्लिमों के स्थानीय घरों में बेरोकटोक प्रवेश और किसी भी महिला से अपनी इच्छानुसार बलात्कार करने का वास्तविक अघोषित अधिकार था ! ज्यादातर मामलों में, पिता भी वानी को अपनी बेटियों के साथ बलात्कार करने में मदद करते थे - यह भारतीय सेना के सूत्रों का कहना है। भारतीय सेना द्वारा मुठभेड़ में मारे जाने के बाद वानी के पास से बरामद कई मोबाइल फोन में कश्मीरी लड़कियों की सैकड़ों कामुक तस्वीरें और उसकी यौन ज़रूरतों को पूरा करने के लिए संपर्कों की एक लंबी सूची मिली थी !

वानी से पहले मुठभेड़ में मारा गया एक और आतंकवादी जिसका उपनाम 'मस्त गुल' (महिलाओं का पुरुष) था, कश्मीर का सबसे कुख्यात प्लेबॉय था। वह उन लड़कियों के प्रति आकर्षित था, जो अभी-अभी यौवन प्राप्त कर रही थीं। जब सेना मुठभेड़ के बाद मस्त गुल के बेजान शरीर को एक पहाड़ी से नीचे खींच रही थी तब महिलाओं की भीड़, जो किशोरावस्था में थीं और थोड़ी बड़ी एवं विवाहित भी थीं, उन सबने अपने अपने टॉप उतार दिए और अपने स्तनों को उसके मृत चेहरे पर दबा दिया था। उन सबके असहाय,बेबस कश्मीरी पतियों ने ,जो गुल के लगातार घरों में घुसने के शिकार थे, उसके मृत शरीर पर थूका था !

गुलमर्ग के बर्फ से ढके सुरम्य पर्वत और श्रीनगर की डल झील ने एक ऐसे समाज को छुपा रखा है, जो कश्मीरी पंडितों के पलायन के बाद दशकों से रक्तपात, मूल्यों में गिरावट और अपनी ही गंदगी का सामना करने के प्रति बेहद अनिच्छुक रवैये से जूझ रहा है !

हर बंदूकधारी आतंकवादी आम कश्मीरियों के लिए नायक था, जिन्होंने बेशर्मी से उन्हें अपनी जवान बेटियों और पत्नियों तक बेरोकटोक पहुंच दी। अपनी पत्नियों को उनसे छुपाने वाले , आतंकवादियों से घृणा करने वाले पुरुष कश्मीर में अल्पसंख्यक हो गए। ऐसी कई कहानियाँ हैं..जहाँ महिलाएँ अपने पहले बच्चे के पिता के रूप में अपने पति के बजाय जिहादी द्वारा पैदा होने पर गर्व महसूस करती थी !

1990 के दशक में आतंकवाद के चरमोत्कर्ष पर कश्मीर की महिलाओं के बीच नारा.."पाकिस्तान जाएंगे, बच्चा लेके आएंगे" एक युद्धघोष की तरह फैला हुआ था। उस समय इसी प्रकार की यौन विकृतियों की अनगिनत घिनौनी कहानियों को दबा दिया गया था...आतंकवादियों को बहादुर एवम सच्चे स्वतंत्रता सेनानी और स्थानीय कश्मीरी मुसलमानों को फासीवादी ,भारतीय राज्य व्यवस्था के दयनीय पीड़ितों के रूप में चित्रित किया गया ! कश्मीर की आजादी के वादे से कहीं अधिक, बंदूक की नोक पर कश्मीरी महिलाओं का यौन शोषण करने की विकृत इच्छा और सम्मान की विकृत भावना ने युवाओं को जिहादी बनने के लिए प्रेरित किया। भारतीय सेना द्वारा पकड़े गए आतंकवादियों की असंख्य कहानियों से किताब भरे पड़े है, जिन्हें जिहाद के बदले में सुंदर कश्मीरी महिलाओं को सौंपने का वादा किया गया था। 

"सर, दस पंद्रह लोग आते हैं, मेरी दो बेटियों को खराब करके के चले जाते हैं ," एक छोटे से कश्मीरी गांव के मुखिया ने भारतीय सेना को यह आपबीती अपने रोते हुए आंखो से सुनाई थी !

सीमा पार से आए बंदूकधारी आतंकवादियों ने इस व्यक्ति की 15 और 18 साल की दो बेटियों को गर्भवती कर दिया था - जिनमें से एक को गर्भपात के लिए दर्दनाक सर्जरी से गुजरना पड़ा था। इसी वजह से इस व्यक्ति जैसे कई लोग भारतीय सेना के मुखबिर बन गए थे !

भारत को कई सालों से कश्मीर के सबसे जघन्य नादीमर्ग हत्याकांड के मास्टरमाइंड अबू माज़ा की तलाश थी, जिसमें आतंकवादियों ने 24 कश्मीरी हिंदुओं और नवजात बच्चों की हत्या कर दी थी। लेकिन वह तभी जाल में फँसा जब एक किशोरी ने सेना को सूचना दी...लड़की (13 साल) माज़ा की शिकार थी, जिसने बंदूक की नोक पर अक्सर उसके और उसकी दो बड़ी बहनों के साथ बलात्कार किया करता था । कश्मीर में छोटी लड़कियों के साथ बलात्कार और यौन उत्पीड़न की कहानियाँ शायद ही कभी छुपी रह पाती थी..इन्हीं लड़कियों को आतंकवादियों द्वारा देह व्यापार में धकेला जाता था । ऐसी कई कश्मीरी लड़कियाँ बड़े शहरों में वेश्यावृत्ति और कॉल गर्ल बन गईं।

आतंकवाद निरोध पर शोधकर्ता और विशेषज्ञ डॉ. अभिनव पंड्या कहते हैं कि आतंकवाद से प्रभावित क्षेत्रों में महिलाएं ही मुख्य रूप से शिकार होती हैं। "उनका मनोवैज्ञानिक आघात बहुत गहरा होता है, हमें उन पर कठोर नहीं होना चाहिए "..महिलाएं किसी भी संघर्ष-ग्रस्त स्थान पर क्रॉस-बेयरर होती हैं। आप दुनिया के विभिन्न हिस्सों में ऐसे रुझान देखेंगे, जहाँ आतंकवाद दशकों से चला आ रहा है। कोई भी ऐसी लड़की से शादी नहीं करना चाहता है जिसे आतंकवादीयों की यौन गुलाम माना जाता हो। उनमें से कईयों को ब्लैकमेल किया जाता है और जबरन देह व्यापार में धकेला जाता है। शायद अनुच्छेद 370 को हटाने से कुछ बदलाव आए !

लेकिन यह बहुत जल्दी करना होगा..राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) के डेटा से पता चलता है कि 2022 की तुलना में इस साल जम्मू और कश्मीर में मानव तस्करी में 15.56 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। NCW की रिपोर्ट ने इस प्रवृत्ति को "हिमखंड का एक टुकड़ा " मात्र कहा है। भारतीय सेना का कहना है कि कम से कम अनुच्छेद 370 को हटाने से उन घाटी की महिलाओं को एक नई उम्मीद तो मिली है। आतंकवाद, देह व्यापार और पाकिस्तान कुछ ऐसे शब्द हैं जिन्हें वे अपनी शब्दावली से मिटाना चाहते हैं।🔰

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