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लोकनिर्माण विभाग सीडी 3 में शासनादेश के विरुद्ध तैनात सहायक अभियंता दुर्गेश कुमार की मुख्यमंत्री कार्यालय में हुई शिकायत, जांच के आदेश

उत्तर प्रदेश सरकार के आला वज़ीर द्वारा जारी ट्रांसफर नीति की जमकर उड़ाई जा रही धज्जी से जुड़े मामले की मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से हुई शिकायत.

शिकायतकर्ता दुर्गेश कुमार मिश्रा ने सीएम योगी को चिठ्ठी लिख मानकों को ताक पर रखकर जीओ व शासनादेश के बावजूद सुल्तानपुर जिले के लोक निर्माण विभाग (PWD) में घोर लापरवाही और रसूखदारी का मामला लाया सामने जिसमें वर्तमान तैनाती के दौरान भ्रष्टाचार व आय से अधिक सम्पत्ति अर्जित करने जैसे गम्भीर आरोप लगाते हुए हाईलेवल इंक्वायरी की मांग । CD-3 डिवीजन के सहायक अभियंता दुर्गेश कुमार वर्ष 2017 में तैनाती के बाद पुनः 2019 को एक बार फिर से हुई पद पर तैनाती, जिससे राज्य सरकार के जीरो टॉलरेंस नीति के आदेशों की खुलेआम अवहेलना की चर्चाएं सरेआम ।

 सुल्तानपुर: शासन के स्पष्ट निर्देश के बावजूद कोई भी अधिकारी अथवा कर्मचारी तीन वर्ष से अधिक समय तक एक ही स्थान पर तैनात नहीं रहेगा बरकरार,सीडी 3 डिवीजन के सहायक अभियंता दुर्गेश कुमार की रिपोस्टिंग बनी जीरो टॉलरेंस नीति पर सवाल । 2019 से दुर्गेश कुमार की लगातार 6 वर्षों से एक ही कुर्सी पर तैनाती योगी आदित्यनाथ के ट्रांसफर नीति को खड़े कर रही आरोपों के कटघरे में, जो ट्रांसफर नीति पर बड़ा सवाल खड़े करने पर बल देती नजर आ रही है। शिकायतकर्ता दुर्गेश कुमार मिश्रा के पत्र पर शासन ने लिया संज्ञान जांच हुई शुरू,सहायक अभियंता दुर्गेश कुमार की मुश्किलें बढ़ना तय

नाम न छापने की शर्त पर विभागीय सूत्रों का दावा है कि सत्ताधारी दल के एक माननीय जो शासन में एक उच्चपदस्थ के इशारे पर ट्रांसपेरेंट ई-टेंडरिंग प्रणाली के मैनेजमेंट पर अभयदान स्वरूप एक ही कुर्सी पर तैनाती का अभयदान अपरोक्ष रूप से दे रखा है। 

सत्ताधारी - माननीय व अधिकारी गठजोड़ के इस रसूख को बेमिशाल बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभा रहा है। जिससे योगी सरकार की सख्त ट्रांसफर नीति भी जिले में फिसड्डी साबित होती नजर आ रही है। जबकि सूबे के मुख्यमंत्री जीरो टॉलरेंस नीति के कसीदे पढ़ते नज़र आते नज़र आ रहे हैं, बैरहाल जानकार कहते हैं कि पंचायत चुनाव के पहले ही ऐसे माननीय व शासन में उच्चपदस्थ अफसरों के सिंडीकेट पर मुख्यमंत्री कार्यालय गोपनीय रिपोर्ट के आधार पर बेमिसाल चाबुक चलाने वाला है, वही शिकायतकर्ता की माने तो जांच रिपोर्ट आते ही माननीय उच्च न्यायालय लखनऊ खंडपीठ में दाखिल करेंगे याचिका

पीडब्ल्यूडी विभाग के अंदरखाने में चर्चा है कि जब तक रसूख और सिफारिशों का बोलबाला रहेगा, तब तक शासनादेश मात्र कागजों तक ही सीमित रह जाएगा। ट्रांसफर नीति का ऐसा उदाहरण ट्रांसपेरेंसी और जवाबदेही पर भी सवाल खड़े करता है।

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