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...जब संडे पहली बार छुट्टी का दिन घोषित हुआ

 📜 10 जून 📜क्या आप जानते हैं कि हमारा संडे कभी वर्किंग डे हुआ करता था और साल 1890 में आज ही के दिन इसे साप्ताहिक अवकाश घोषित किया गया था...


>> जब संडे पहली बार छुट्टी का दिन घोषित हुआ <<

क्या आपके साथ भी ऐसा होता है कि संडे आते ही आपकी बांछें खिल जाती हैं. आप देर तक सोते हैं और अपने सारे पेंडिंग काम निपटाते हैं, तो हम आपकी जानकारी के लिए बता दें के साल 1890 से पहले ऐसी व्यवस्था नहीं थी. साल 1890 में 10 जून वो दिन था, जब रविवार को साप्ताहिक अवकाश के रूप में चुना गया.

1. ब्रिटिश शासन के दौरान मिल मजदूरों को हफ्ते में सातों दिन काम करना पड़ता था.

2. यूनियन नेता नारायण मेघाजी लोखंडे ने पहले साप्ताहिक अवकाश का प्रस्ताव किया, जिसे नामंजूर कर दिया गया.

3. अंग्रेजी हुकूमत से 7 साल की सघन लड़ाई के बाद अंग्रेज रविवार को सभी के लिए साप्ताहिक अवकाश बनाने पर राजी हुए.

4. इससे पहले सिर्फ सरकारी कर्मचारियों को छुट्टी मिलती थी.

5. दुनिया में इस दिन छुट्टी की शुरुआत इसलिए हुई, क्योंकि ये ईसाइयों के लिए गिरिजाघर जाकर प्रार्थना करने का दिन होता है.

>> साप्ताहिक छुट्टी के लिए उठाई आवाज <<

उस समय 'श्री नारायण जी मेघाजी लोखंडे' मिल के मजदूरों के नेता थे। उन्होंने अंग्रेज अधिकारियों से भारतीय कामगारों को भी सप्ताह में एक दिन छुट्टी देने को कहा। उनका कहना था कि पूरे हफ्ते काम करने के बाद एक दिन का अवकाश दिया जाना सबके लिए जरूरी है। उन्होंने कहा कि रविवार खंडोबा देवता का भी दिन है, इसलिए इस दिन अवकाश दिया जाना चाहिए। 

>> अंग्रेजों ने अस्वीकार कर दिया <<

अंग्रेज मिल मालिकों और अधिकारियों ने सप्ताह में रविवार को अवकाश दिए जाने के लोखंडे के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। उनका कहना था कि मजदूरों को अवकाश नहीं दिया जा सकता। उन्हें अवकाश देने पर उत्पादन का काम प्रभावित होगा।

>> लोखंडे ने जारी रखा संघर्ष <<

प्रस्ताव अस्वीकार कर दिए जाने के बाद भी लोखंडे निराश नहीं हुए और कामगारों को रविवार को अवकाश दिलाने के के लिए उन्होंने संघर्ष जारी रखा। आखिर अंग्रेजों को उनकी मांग के आगे झुकना पड़ा और 7 साल के लंबे संघर्ष के बाद 10 जून, 1890 को ब्रिटिश सरकार ने रविवार को छुट्टी का दिन घोषित किया। 

>> ट्रेड यूनियन आंदोलन के जनक <<

लोखंडे को भारत में ट्रेड यूनियन आंदोलन का जनक भी माना जाता है। उन्होंने पहली बार कपड़ा मिल मजदूरों को उनके अधिकारों के बारे में जागरूक करने और उन्हें संगठित करने की कोशिश की। भारत सरकार ने साल 2005 में उनके सम्मान में उन पर एक डाक टिकट भी जारी किया।

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